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Sunday, 14 August 2016



रास्ते के सुन्दर दृश्य

नैनीताल का सफर


नैनीताल का रास्ता मुज़फ्फरनगर से बिजनोर हो कर है । जो हमारे घर से लगभग 50 कि0 मी0 पड़ता है । लेकिन बिजनोर का एरिया खादर का एरिया कहलाता है । जहाँ रात को जाना सुरक्षित नहीं माना जाता । इसलिए हमें घर से निकलने की कोई जल्दी नहीं थी । हम सुबह 7 बजे घर से चले । 8 बजे के लगभग हम बिजनोर पहुँच गए । इस समय तक मुज़फ्फरनगर बिजनोर के बीच ट्रेफिक शुरू हो जाता है इसलिए डर वाली कोई बात नहीं थी । बिजनोर पहुँच कर हमने एक सज्जन से काशीपुर का रास्ता पूछा । यहाँ एक गडबड हो गई । बिजनोर से काशीपुर दो रास्ते जाते है एक धामपुर जसपुर होते हुये काशीपुर , दूसरा नगीना अफजलगढ़ जसपुर होते हुए काशीपुर । उन सज्जन ने हमें नगीना वाला रास्ता बता दिया और हम नगीना की तरफ चल पड़े । लगभग 10 कि0 मि0 आगे जा कर फिर रास्ता पूछा तो सही बात पता चली । लेकिन अब वापसी जाने का कोई फायदा नहीं था । इसलिए इसी रास्ते से आगे बढ़ गए । नगीना के रास्ते काशीपुर लगभग 98 कि0 मी0 पड़ता है जो धामपुर के रास्ते 7 -8 क़ि0 मी0 फालतू है । रास्ते में भूख लगी तो गाड़ी में चलते चलते ही बिस्किट नमकीन और चिप्स खा लिए । लेकिन इन चीजों से पेट तो नहीं भरता । लगभग साढ़े दस बजे हम काशीपुर पार कर गये । अब नैनीताल 83 कि0 मी0 रह गया था । लेकिन सबको भूख लगने लगी थी । काशीपुर से लगभग 10 कि0 मि0 आगे एक ढाबा पड़ा , गाड़ी वहीं रोक दी । नास्ते में आलू के पराँठे माँगा लिए । ये ढाबा कम रोड साइड ओपन रेस्टोरेंट ज्यादा था जो काफी बड़ी जगह में बनाया गया था । ढाबे के पीछे बहुत खेती की जमीन थी जहाँ जाने के लिए ढाबे में से ही एक गेट बनाया हुआ था । ढाबे के बराबर में कोई बड़ा सा प्लांट था । पूछने पर पता चला ये चीमा पेपर मिल है । मैं ये बात इतने विस्तार से इसलिये बता रहा हूँ क्योंकि मैंने चीमा परिवार के बारे में पढ़ा है । ये परिवार पार्टीशन के समय पाकिस्तान से आया था । इनके पास कुछ नहीं था । इस इलाके में पूरी तरह जंगल था । इन्होंने मेहनत करके अपने रहने व खेती की जगह बना ली । कुछ समय बाद उस इलाके के कमिश्नर वहाँ हाथी पर दौरा करने निकले । वो चीमा परिवार की मेहनत देखकर बहुत खुश हुए । उन्होंने चीमा परिवार के मुखिया से कहा कि तुम इस इलाके का जितना जंगल साफ कर सकते हो वो ज़मीन तुम्हारी हो जायेगी । उन लोगो ने बहुत मेहनत की और काफी बड़े भूभाग से जंगल साफ कर दिया । कमिश्नर ने अपना वादा निभाया । वो सारी जमीन चीमा परिवार के नाम कर दी । आज भी इस इलाके में चीमा परिवार के लोग बहुतायत में रहते है । बातों बातों में ये भी पता चला की उस रेस्टोरेंट का मालिक भी चीमा परिवार से ही है ।

हम हेवी नाश्ता करके लगभग साढ़े ग्यारह बजे हम अपने रास्ते चल दिए । इसके आगे का रास्ता काफी अच्छा था । लगभग 10 - 12 कि0 मी0 चलकर एक चौराहा आया । जहां से सामने रुद्रपुर , सीधे हाथ मुरादाबाद और उल्टे हाथ कालाडूंगी की तरफ चला जाता है ।सो हम उल्टे हाथ मुड़ गये । अब सड़क बिलकुल खाली थी । लेकिन सड़क सीधी होने के बावजूद सड़क पर चढ़ाई थी । जिसकी वजह से गाड़ी बहुत तेज नहीं चल रही थी । लगभग 22 कि0 मी0 चलकर कालाडूंगी आ गया । यहाँ से नैनीताल के लिए पहाड़ी रास्ता शुरू होता है । जो लगभग 35 कि0मी0 का है । लेकिन सड़क पर ट्रेफिक बिलकुल नहीं था । रास्ते में सुन्दर सुन्दर पहाड़ी सीन दिखने शुरू हो गए । सब लोग गाड़ी रोकने की जिद करने लगे । गाडी से उतर कर कुछ देर मजे किये । फिर चल दिए अपने गंतव्य की ओर । रुकते रुकाते लगभग 3 बजे हम नैनीताल पहुँच गए ।

रास्ते के सुन्दर दृश्य

नैनीताल वाया काळाडूंगी

बरसात का मौसम

 बादलों का दृश्य

रास्ते के सुन्दर दृश्य

नैनीताल के रास्ते वाया काळाडूंगी

नैनीताल के रास्ते

नैनीताल वाया काळाडूंगी

बरसात का मौसम था

नैनीताल के रास्ते के सुन्दर दृश्य